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हैंण्डपंप से नहीं, झरिया के पानी से बुझती है ग्रामीणों की प्यास

मेखावाया ग्राम पंचायत के खासपारा में पानी की किल्लत, गांव के 130 घर झरिया पर निर्भर.

सुकमा. छिंदगढ़ विकासखण्ड के ग्राम पंचायत मेखावाया में पानी की किल्लत से ग्रामीण परेशान हैं. आलम यह है कि इंसान और मवेशी को एक ही झरिया से प्यास बुझानी पड़ रही है. मेखवाया ग्राम पंचायत के खासपारा में पांच हैंण्डंप हैंं लेकिन पीने योग्य एक भी नहीं है. मजबूरन ग्रामीणों द्वारा गांव के पास खेत में बने झरिया का पानी पीने के उपयोग में लिया जा रहा है. गांव में करीब सौ से ज्यादा घर हैं.

प्रदेश से लेकर पंचायतों में सरकारें जरूर बदल गई है लेकिन गांव के हालातोंं मेंं कोई परिवर्तन नहीं आया है. ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधायें आज भी कोसो दूर हैं. सरकारी मंचों से निर्वाचित जनप्रतिनिधी और अफसर विकास के लाख दावे कर ले लेकिन धरातल पर कुछ और ही नजर आता है. छिंदगढ़ विकासखण्ड के मेखावाया ग्राम पंचायत के खासपारा के ग्रामीणों की हालत देखने के बाद कोई भी दावे से कह सकता है. यहां जलस्रोत के नाम पर गांव से एक किमी दूर जंगल में एकमात्र झरिया है, जिसके गंदे पानी से मवेशी और इंसान दोनों की प्यास बुझती है. इसी झरिया में जानवर और इंसान नहाते हैं. गर्मी के दिनों में वह भी साथ छोड़ देती है.

पांच हैंण्डपंप, पर पीने योग्य नहीं है पानी…
गांव के सुकड़ा मड़काम, चमरू मड़कामी और आसमती नाग ने बताया कि मेखावाया के खासपारा में 130 घर हैं. गांव के दो पारा में कुल पांच हैंण्डपंप हैं. जिनमें से तीन हैंण्डपंप खराब अवस्था में हैं. एक हैंण्डपंप में सोलर की व्यवस्था की गई है. दूर होने के कारण ग्रामीण यहां तक नहीं पहुंच पाते हैं. वहीं दूसरा हैण्डपंप से गंदा एवं आयरन युक्त पानी निकलता है जो पीने योग्य नहीं है. ग्रामीणों के अनुसार कई बार सरपंच और सचिव से गांव में शुद्ध पेयजल की मांग की गई है लेकिन कभी इस दिशा में काम नहीं हुआ. मजबूरन झरिया के पानी से प्यास बूझाना पड़ रहा है.

सरपंच ने कहा नहीं सुनते अधिकारी…
मेखावाया सरपंच बीड़राम कवासी ने बताया कि खराब पड़े हैण्डपंप को सुधारने कई बार जिम्मेदार अधिकारियों को मौखिक और लिखित शिकायत कर चुके हैं. बावजूद इसके कोई सुधार नहीं किया गया है. गांव में एकमात्र सोलर हैंण्डपंप से शुद्ध पेयजल की व्यवस्था हो पाती है. दूर होने के कारण ग्रामीण हैण्डपंप का इस्तेमाल नहीं करते हैं.

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